रायपुर।
किसी आदमी ने तय किया कि उसे छत्तीसगढ़ में उद्योग लगाना है। उसके पास पैसा है, जमीन की तलाश है, कारोबार की समझ है और आगे बढ़ने का इरादा भी। लेकिन जैसे ही वह उद्योग लगाने की प्रक्रिया में प्रवेश करता है, उसके सामने एक दूसरा सवाल खड़ा हो जाता है—काम शुरू करने से पहले कितने काम करने पड़ेंगे?
जमीन के लिए अलग प्रक्रिया, बिजली के लिए अलग आवेदन, पानी के लिए अलग विभाग, पर्यावरण की अनुमति अलग और बाकी औपचारिकताओं के लिए अलग-अलग दफ्तर।
यहीं से किसी निवेशक का उत्साह अक्सर परीक्षा में बदल जाता है।
आज दुनिया में निवेश सिर्फ इस आधार पर नहीं आता कि किसी राज्य के पास कितने संसाधन हैं। निवेशक यह भी देखता है कि उसका समय कितना बचेगा, प्रक्रिया कितनी साफ होगी और सरकार के साथ काम करना कितना आसान होगा।
छत्तीसगढ़ इसी जगह अपनी तस्वीर बदलने की कोशिश कर रहा है।
Ease of Doing Business का मतलब यहां केवल अंग्रेजी का कोई सरकारी शब्द नहीं है। इसका सीधा मतलब है—जिस काम के लिए आदमी कारोबार लेकर आया है, वह काम सरकारी प्रक्रियाओं में फंसकर छोटा न पड़ जाए।
निवेशक को हर काम के लिए अलग दरवाजा न खटखटाना पड़े
सरकार और निवेशक के रिश्ते में सबसे बड़ा बदलाव शायद यही है कि अब व्यवस्था धीरे-धीरे निवेशक को विभाग खोजने के बजाय एक व्यवस्था के भीतर विभाग तक पहुंचाने की ओर बढ़ रही है।
छत्तीसगढ़ का OneClick Single Window System इसी सोच का हिस्सा है।
उद्योग लगाने वाले व्यक्ति को अलग-अलग अनुमति के लिए अलग-अलग जगह भटकने के बजाय एकीकृत डिजिटल व्यवस्था के जरिए आवेदन, स्वीकृति और उसकी स्थिति की जानकारी मिल सके—व्यवस्था का उद्देश्य यही है।
सुनने में यह छोटी बात लग सकती है, लेकिन कारोबारी के लिए इसका मतलब बड़ा है।
क्योंकि कारोबार में समय भी पैसा होता है।
एक आवेदन की जानकारी लेने में लगा एक दिन, किसी अधिकारी से मिलने के लिए लगा आधा दिन, किसी कागज की कमी के कारण दोबारा जाना—ये सब मिलकर किसी परियोजना की लागत बढ़ाते हैं।
सरकार अगर इन छोटे-छोटे समय के नुकसान को रोक पाती है तो निवेशक के लिए यह किसी बड़े प्रोत्साहन से कम नहीं।
उद्योग की पहली जरूरत मशीन नहीं, जमीन है
किसी फैक्ट्री की शुरुआत मशीन से नहीं होती। शुरुआत जमीन से होती है।
और जमीन मिलना जितना आसान होगा, उद्योग की शुरुआत उतनी ही जल्दी हो सकती है।
छत्तीसगढ़ ने औद्योगिक भूमि आवंटन की प्रक्रिया को भी डिजिटल और समयबद्ध बनाने की दिशा में काम किया है। GIS आधारित व्यवस्था और निर्धारित समयसीमा जैसी व्यवस्थाएं इसी कोशिश का हिस्सा हैं।
यानी निवेशक को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि “जमीन है।”
जरूरी यह है कि उसे यह भी पता हो कि “जमीन मिलने की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी।”
यही फर्क किसी राज्य की औद्योगिक व्यवस्था को निवेशक के लिए भरोसेमंद बनाता है।
बिजली-पानी की चिंता कम हो तो उद्योग की चिंता बढ़ सकती है
उद्योग लग गया तो अगली जरूरत उत्पादन की है। उत्पादन के लिए बिजली चाहिए, पानी चाहिए और कई दूसरी सेवाएं चाहिए।
अगर इन बुनियादी सुविधाओं के लिए निवेशक को हर बार किसी नए दफ्तर का पता पूछना पड़े तो आधुनिक उद्योग व्यवस्था का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।
छत्तीसगढ़ में बिजली और पानी जैसी सेवाओं को भी ऑनलाइन और समयबद्ध बनाने पर जोर दिया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है।
Ease of Doing Business का असली मतलब सुविधाओं की संख्या नहीं, परेशानी की संख्या कम होना है।
यही वह बदलाव है जिसे निवेशक अपनी रोजमर्रा की प्रक्रिया में महसूस करता है।
सरकार की भूमिका अब सिर्फ अनुमति देने की नहीं, रास्ता आसान करने की है
उद्योग और सरकार के बीच रिश्ता हमेशा से रहा है। फर्क अब यह है कि कारोबार की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है।
निवेशक के पास विकल्प हैं। वह उस जगह जाना चाहता है जहां उसे केवल अच्छी नीति नहीं, बल्कि नीति को जमीन पर लागू करने वाली व्यवस्था भी मिले।
इसलिए आज किसी राज्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा सिर्फ उसके खनिज, बिजली या जमीन से तय नहीं होती।
प्रतिस्पर्धा इस बात की भी है कि वहां काम कितनी आसानी से होता है।
छत्तीसगढ़ के सामने भी यही चुनौती है।
बड़ा उद्योग आए, लेकिन उसके साथ छोटा कारोबार भी खड़ा हो
किसी बड़े उद्योग की घोषणा सुनना निश्चित रूप से अच्छी खबर है। लेकिन किसी राज्य की असली आर्थिक तस्वीर तब बदलती है जब एक बड़े उद्योग के आसपास दर्जनों छोटे कारोबार पैदा होते हैं।
कोई सामान सप्लाई करता है, कोई पैकेजिंग करता है, कोई परिवहन, कोई मरम्मत, कोई सर्विस और कोई दूसरी जरूरत पूरी करता है।
यानी एक उद्योग अकेला उद्योग नहीं रहता।
वह अपने साथ एक पूरा छोटा कारोबारी संसार खड़ा कर सकता है।
यही कारण है कि Ease of Doing Business की चर्चा केवल बड़े निवेशकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए आसान प्रक्रिया का मतलब है—कम झंझट में नया कारोबार शुरू करने की संभावना।
और छोटे कारोबार बढ़ते हैं तो स्थानीय बाजार में पैसा घूमता है।
छत्तीसगढ़ अब अपनी पुरानी पहचान से आगे देख रहा है
छत्तीसगढ़ की औद्योगिक पहचान कोयला, लौह अयस्क, बिजली और इस्पात से बनी है।
लेकिन अब कहानी वहीं खत्म नहीं होती।
नई औद्योगिक नीति में फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल, आईटी, फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों को भी जगह मिल रही है। यानी राज्य अपनी अर्थव्यवस्था को केवल उन क्षेत्रों पर निर्भर नहीं रखना चाहता जिनसे उसकी पुरानी पहचान बनी है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नए उद्योग सिर्फ नई मशीनें नहीं लाते।
वे नई तकनीक, नए कौशल और नए रोजगार भी लेकर आते हैं।
एक युवा के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि नौकरी के लिए उसे अपने शहर या राज्य से बाहर जाने की जरूरत कम पड़े।
निवेशक को सबसे ज्यादा जरूरत भरोसे की होती है
किसी निवेशक को बुलाना आसान है।
उसे यह विश्वास दिलाना मुश्किल है कि जिस जगह वह करोड़ों रुपये लगाएगा, वहां उसका काम समय पर आगे बढ़ेगा।
वह नीति देखता है। प्रक्रिया देखता है। सरकारी व्यवस्था देखता है। अनुमति में लगने वाला समय देखता है। निवेश के बाद मिलने वाली सहायता देखता है।
यही वजह है कि Ease of Doing Business को केवल एक अभियान मानकर नहीं देखा जा सकता।
यह धीरे-धीरे सरकार और कारोबारी के बीच संबंध की एक नई भाषा बन रही है।
पुरानी भाषा में सवाल था—
“आपको कौन-कौन सी अनुमति चाहिए?”
नई व्यवस्था का सवाल होना चाहिए—
“आपको उद्योग शुरू करने के लिए हमारी तरफ से और क्या आसान करना है?”
यही अंतर बहुत बड़ा है।
आखिर इस पूरी कवायद का फायदा किसे मिलेगा?
जवाब सिर्फ निवेशक नहीं है।
निवेश आएगा तो निर्माण होगा। निर्माण होगा तो रोजगार आएगा। रोजगार आएगा तो स्थानीय बाजार मजबूत होगा। छोटे कारोबारी जुड़ेंगे तो सप्लाई चेन बनेगी। सरकार को राजस्व मिलेगा और राज्य की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी।
इसलिए Ease of Doing Business का अंतिम लाभ उद्योगपति की सुविधा से कहीं बड़ा है।
यह उस युवा तक पहुंच सकता है जो नौकरी की तलाश में है।
उस छोटे कारोबारी तक पहुंच सकता है जो अपने शहर में ही कुछ शुरू करना चाहता है।
उस उद्यमी तक पहुंच सकता है जिसके पास विचार तो है, लेकिन सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता से वह पीछे हट जाता है।
असली परीक्षा अब आगे है
छत्तीसगढ़ में निवेश का माहौल आसान बनाने के लिए व्यवस्था में बदलाव किए जा रहे हैं। सिंगल विंडो, ऑनलाइन सेवाएं, समयबद्ध प्रक्रिया, भूमि प्रबंधन और निवेश प्रोत्साहन जैसे कदम इसी दिशा में हैं।
लेकिन किसी भी नीति की असली सफलता कागज पर नहीं, जमीन पर दिखाई देती है।
जब कोई निवेशक यह कहे कि उसे उद्योग लगाने में अनावश्यक समय नहीं गंवाना पड़ा।
जब कोई छोटा उद्यमी यह कहे कि उसने अपना काम सरकारी चक्कर काटे बिना शुरू कर लिया।
जब कोई युवा यह कहे कि उसके शहर में ही उसे रोजगार मिल गया।
तब माना जाएगा कि Ease of Doing Business सचमुच Ease of Living और Ease of Earning में बदल रही है।
छत्तीसगढ़ के लिए यही अगला पड़ाव है।
क्योंकि निवेशक को सिर्फ जमीन नहीं चाहिए।
उसे सिर्फ सब्सिडी नहीं चाहिए।
उसे सिर्फ खूबसूरत निवेश सम्मेलन भी नहीं चाहिए।
उसे चाहिए भरोसा कि वह यहां आएगा, अपना कारोबार लगाएगा और बिना अनावश्यक रुकावट के उसे आगे बढ़ा सकेगा।
छत्तीसगढ़ की नई औद्योगिक कहानी की सबसे महत्वपूर्ण लाइन शायद यही है—
निवेश को बुलाना पहला कदम है, उसे आसानी से जमीन पर उतारना असली काम।
और अगर यह बदलाव सचमुच जमीन पर उतरता है, तो इसका असर सिर्फ उद्योगों की संख्या में नहीं दिखेगा (छत्तीसगढ़ के बाजार, शहरों, रोजगार और आम आदमी की जिंदगी में भी दिखाई देगा।)







