कलकत्ता
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से 20 सांसदों के बगावत का मामला उलझ गया है. बीसों सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजेन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) ज्वांइन किया था. इनमें वे तीन मुस्लिम सांसद भी थे जो कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते हैं. इन तीनों सांसदों के नाम हैं- पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान, अबू ताहेर और खलीलुर रहमान. अब इन तीनों मुस्लिम सांसदों ने NCPI के भीतर बगावत कर दी है. इन्होंने एनडीए के साथ जाने के NCPI के प्रस्ताव का विरोध किया है. इनके इस विरोध से बागियों को मान्यता मिलने का पूरा मामला जलेबी की तरह उलझ गया है।
विलय को अभी तक मान्यता नहीं
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने NCPI में टीएमसी के बागियों के विलय को अभी तक आधिकारिक तौर मान्यता नहीं दी है. यानी सदन में वे अभी तक एक अलग राजनीतिक दल नहीं हैं. यह सब काम लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को करना है. लेकिन, स्पीकर ने इन बागी सांसदों के लिए सदन में बैठने की अलग व्यवस्था तो की है लेकिन अभी तक मान्यता नहीं दी है. इस बीच यह नया पेंच सामने आया है. 18 जुलाई को संसद के मानसून सत्र शुरू होने के वक्त स्पीकर ने इन बागियों को मूल टीएमसी के सदस्यों से अलग बिठाया था।
विलय को मंजूरी की क्या है स्थिति
गुरुवार की तारीख तक स्पीकर ने टीएमसी के बागियों की NCPI में विलय को मंजूरी नहीं दी है. दूसरी तरह बीते दिनों स्पीकर ने शिवसेना में उद्धव गुट के छह सांसदों के विलय को मंजूरी दे दी थी. टीएमसी के बागियों के विलय को लेकर दल-बदल कानून के तहत गंभीर सवाल उठाए गए थे. इस बीच NCPI में नया बगावत हो गया है. ऐसे में पूरा मामला जलेबी की तरह उलझ गया है. कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञ दल-बदल कानून के 10वें शेड्यूल के तहत दो तिहाई सांसदों के टूटने को सदन में मान्यता देने की कानूनी वैधता की जांच कर रहे हैं।
कानूनी विवाद
दरअलस, ममता बनर्जी गुट ने बागी सांसदों के NCPI में विलय की कोशिश के खिलाफ कानूनी जंग छेड़ दी है. उसने स्पीकर ओम बिड़ला को पत्र लिखा है कि उनकी पार्टी अब भी एक और अटूट है. पार्टी का दावा है कि कोई गुट सदन में खुद के लिए अलग पहचान का दावा नहीं कर सकता. इस कारण स्पीकर अभी तक इन बागियों की स्थिति को लेकर कोई कानूनी फैसला नहीं ले पाए हैं।
आगे क्या
मौजूदा स्थिति में टीएमसी के इन बागियों को कानूनी और संवैधानिक तौर पर NCPI का सदस्य नहीं माना गया है. हालांकि व्यवहारिक तौर पर सरकार उनको अलग मान रही है. इस बीच बागियों में भी अब बगावत हो गया है. ऐसे में कई स्थितियां पैदा हो रही है।
1- क्या अब टीएमसी में बगावत के लिए जरूरी दो-तिहाई सदस्य नहीं जूट पाएंगे. टीएमके पास कुल 28 सांसद थे. लोकसभा में बगावत के लिए कम से कम 20 सांसदों के जरूरत थी. बागियों ने ये संख्या बल तो जुटा लिया लेकिन अब इनमें से तीन मुस्लिम सांसदों अबू ताहिर खान, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान ने NCPI पार्टी के एनडीए का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है।
अब सवाल यह है कि इन तीनों मुस्लिम सांसदों की बगावत के बाद क्या 20 सांसदों वाला बागी गुट खुद अल्पमत में आ गया है. ऐसे में टीएमसी से बगावत के कारण उनकी सांसदी चली जाएगी।
या फिर अगर NCPI को एक पार्टी माना जाता है तो उसमें नए सिरे से बगावत के लिए फिर तो तिहाई सदस्य चाहिए. यानी कम से 14 सांसदों को बागी बनना होगा. लेकिन अभी केवल तीन सांसदों ने बागी रुख अपनाया है. ऐसे में क्या तीनों मुस्लिम सांसदों की सदस्यता जाएगी।
हर स्थिति में ममता के हाथ में लड्डू
इन दोनों स्थितियों में ममता बनर्जी के हाथ में लड्डू है. अगर सभी 20 सांसद बागी करार दिए जाते हैं तो उनकी सीटों पर फिर से चुनाव होंगे और ममता दमखम के साथ मैदान में उतरेंगी. अगर तीन मुस्लिम सांसदों को बागी करार दिया जाता है तो भी वहां उप चुनाव होंगे और ममता दमखम के साथ चुनाव लड़ेगी. ये तीनों मुस्लिम बहुल सीट हैं और वहां भाजपा को बड़ी चुनौती मिलेगी. यानी पूरा खेल अब बुरी तरह उलझ गया है।







