Home मध्य प्रदेश 2300 साल पुरानी वैश्य टेकरी फिर बनेगी शोध का केंद्र, 88 साल...

2300 साल पुरानी वैश्य टेकरी फिर बनेगी शोध का केंद्र, 88 साल बाद उत्खनन की तैयारी शुरू

4
0

उज्जैन 

 कानीपुरा स्थित वैश्य टेकरी के रूप में स्थित विश्व के सबसे बड़े बौद्ध स्तूप में छिपा 2300 साल पुराना रहस्य जल्द सामने आएगा। 88 साल बाद एक बार फिर वैश्य टेकरी के उत्खनन की तैयारी की जा रही है।

शुक्रवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की नई दिल्ली, भोपाल, इंदौर तथा उज्जैन के पुराविदों के दल ने टेकरी का जीपीआर (ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार) सर्वे किया। इस तकनीक से जमीन के अंदर दबी हुई दीवारें, कक्ष, नींव, अन्य संरचनाओं तथा दबी हुई वस्तुओं का आसानी से पता लगाया जा सकता है। साथ ही उत्खनन का प्लान भी तैयार किया जा सकता है।

वैश्य टेकरी स्थित बौद्ध महास्तूप देश के बड़े स्तूपों में से एक है। इसका व्यास 350 फीट तथा ऊंचाई 100 फीट से अधिक है। मान्यता है सम्राट अशोक ने इसका निर्माण कराया था। पाली भाषा में निर्मिथ बौद्ध ग्रंथों में इस स्तूप का उल्लेख मिलता है।

कहा जाता है गौतम बुद्ध के महाप्रयाण के उपरांत उनसे जुड़ी सैंकड़ों वस्तुओं को देश और विदेश में रहने वाले उनके अनुयायियों में बांट दिया गया था। उन वस्तुओं में तात्कालिक मौर्य शासकों को, जो स्वयं भी बौद्ध अनुयायी थे उन्हें गौतम बुद्ध की आसंदी और चीवर मिले थे। ऐसा माना जाता है वैश्य टेकरी बौद्ध स्तूप में इन दोनों वस्तुओं को रखा गया है। इसीलिए विश्वभर के बौद्ध अनुयायियों के लिए यह स्थान तीर्थ के समान है।
1938-39 में हुआ था उत्खनन, रोकना पड़ा

पुरातत्व के जानकार व इतिहासकार बताते हैं सन 1938-39 में वैश्य टैकरी का उत्खनन हुआ था। एनबी गर्दे के निर्देशन में टेकरी की खोदाई की गई थी। इसके मुहाने पर एक वर्तुलाकार गड्ढा खोदा गया था। लेकिन दो हजार साल से अधिक समय तक बंद रहने के कारण इसमें गैस जमा हो गई थी, खोदाई के दौरान कई श्रमिक इसके प्रभाव में आए और बेहोश हो गए। इसके बाद उत्खनन कार्य बंद कर दिया गया। अब 88 साल बाद फिर से इसके उत्खनन की तैयारी की जा रही है।
दल में यह विशेषज्ञ शामिल

शुक्रवार को जीपीआर तकनीक से वैश्य टेकरी का सर्वेक्षण करने आए विशेषज्ञों ने मीडिया से कोई जानकारी साझा नहीं की। दल में नई दिल्ली के शिवाकांत वाजपेयी, डा.ऋतुजा चव्हाण, डा.ज्योति सवरूप, डा.रमेश यादव, डा.आशुतोष महाशब्दे, उज्जैन के पुराविद् व त्रिवेणी संग्रहालय के संग्रह अध्यक्ष डा.योगेश पाल, डा.अंकित चौहान आदि शामिल थे।
बढ़ेगा अवंतिका का महत्व

छठी शताब्दी ईसा पूर्व अखंड भारत के सोलह जनपद थें, इनमें से उज्जैन को अवंति महाजनपद कहा जाता था। यह नगरी शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र मानी जाती थी। कर्क रेखा गुजरने से यह नगरी कालगणना का भी प्रमुख केंद्र रही है। शासन की मंशा है कि अवंति महाजनपद का वैभव और बढ़े। इसी उद्देश्य से वैश्य टेकरी के उन्नयन की तैयारी की जा रही है। बौद्ध स्तूप के विकास के बाद यहां जापान, चीन, रशिया, कंबोडिया, श्रीलंका जैसे देश में रहने वाले बौद्ध अनुयायी आएंगे। इससे एक और जहां उज्जैन का धार्मिक महत्व और बढ़ेगा। आर्थिकी भी बढ़ेगी।
 

88 साल पहले की खोदाई में मिली थे नरकंकाल

वैश्य टेकरी के समीप कुम्हार टेकरी भी है। यहां भी 1938-39 में खोदाई हुई थी। तब इसमें अलग-अलग अवस्थाओं में (बैठे, लेटे आदि) नरकंकाल मिले थे। इसका भी पूरी तरह से अध्ययन नहीं हो पाया। वैश्य टेकरी के साथ एएसआइ कुम्हार टेकरी का भी अध्ययन करेगी।
मौर्यकाल की ईंटे प्राप्त हुई थी

पुराविदों का कहना है कि 1938-39 में खोदाई के दौरान स्तूप की दीवार गुंबद की तरह गोल दिखाई दे रही थीं। खोदाई में जो ईंटे प्राप्त हुई थी वें 22.6 गुणा 18.6 / 15.6 गुणा 3.7 इंच आकार की थी।
क्या होती है जीपीआर तकनीक

ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक के तहत भूमि के भीतर रडार से तरंगे भेजी जाती हैं। जब ये तरंगे किसी वस्तु या अलग घनत्व से टकराकर वापस आती हैं तो विशेष उपकरण उन्हें रिकार्ड कर वस्तु आदि का चित्र अथवा नक्शा बना देते हैं। आधुनिक समय में इसका उपयोग पाइप लाइन आदि के सर्वे के लिए किया जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here